मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और चिकित्सा अनुसंधान के लिए दान किया शरीर, क्षेत्रभर में हो रही सराहना
लखनऊ। इंसान अपने जीवन के साथ-साथ अपने अंतिम निर्णय से भी समाज को नई दिशा दे सकता है। राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब (बीकेटी) थाना क्षेत्र के कठवारा गांव निवासी 75 वर्षीय मंगल ने मृत्यु के बाद भी मानवता की ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी पूरे क्षेत्र में चर्चा हो रही है। उन्होंने वर्ष 2013 में अपनी मृत्यु के बाद देहदान करने का संकल्प लिया था। शनिवार को बीमारी के चलते उनके निधन के बाद उनका यह संकल्प पूरा हुआ और मेडिकल कॉलेज की टीम आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर उनका पार्थिव शरीर अपने साथ ले गई।
13 वर्ष पहले लिया था समाज सेवा का संकल्प
परिजनों के अनुसार मंगल का मानना था कि मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम संस्कार करने के बजाय यदि वह मेडिकल छात्रों की पढ़ाई, चिकित्सा अनुसंधान और नई पीढ़ी के डॉक्टर तैयार करने में उपयोगी हो सके तो इससे बड़ी समाज सेवा कोई नहीं हो सकती। इसी सोच के साथ उन्होंने वर्ष 2013 में विधिवत देहदान का पंजीकरण कराया था।
निधन के बाद मेडिकल कॉलेज की टीम पहुंची गांव
शनिवार को उनके निधन की सूचना मिलते ही मेडिकल कॉलेज के अधिकारी एवं कर्मचारी कठवारा गांव पहुंचे। सभी कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद पार्थिव शरीर को मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। अब इस देह का उपयोग एमबीबीएस सहित अन्य चिकित्सा पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों की पढ़ाई और चिकित्सा अनुसंधान में किया जाएगा।
क्षेत्रभर में हो रही सराहना
मंगल के इस प्रेरणादायी निर्णय को लेकर पूरे क्षेत्र में लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। ग्रामीणों, समाजसेवियों और शुभचिंतकों ने कहा कि उनका यह कदम मृत्यु के बाद भी मानव सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है। लोगों का मानना है कि इससे समाज में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और अधिक लोग इस दिशा में आगे आने के लिए प्रेरित होंगे।
देहदान क्यों है महत्वपूर्ण?
देहदान चिकित्सा शिक्षा और शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस और अन्य चिकित्सा पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना का व्यावहारिक अध्ययन करने के लिए देहदान की आवश्यकता होती है। इसके अलावा नई चिकित्सा तकनीकों, उपचार पद्धतियों और अनुसंधान कार्यों में भी देहदान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में मंगल का निर्णय केवल एक व्यक्ति का संकल्प नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा के लिए एक अमूल्य योगदान है।
