आज लखनऊ में भारतीय जनसंघ के संस्थापक, महान शिक्षाविद् और राष्ट्रवाद के पुरोधा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बलिदान दिवस पर उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित किए।
एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे" का संकल्प लेने वाले डॉ. मुखर्जी का संपूर्ण जीवन अखंड भारत के स्वप्न को समर्पित था। उनका त्याग और बलिदान हम सभी के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को नमन!
मेरा उद्देश्य है- भारत की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखना, चाहे इसके लिए मुझे कोई भी मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। @KANWHIZZTIMES
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: एक युगपुरुष
शिक्षाविद और सबसे युवा कुलपति: डॉ. मुखर्जी केवल 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice-Chancellor) बने थे। वे उस समय दुनिया के सबसे कम उम्र के कुलपति थे।
शिक्षा का प्रसार: उन्होंने उच्च शिक्षा में मातृभाषा को सम्मान दिलाने के लिए अथक प्रयास किए और कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में पहली बार बंगाली भाषा में संबोधन की परंपरा शुरू की।
भारतीय जनसंघ के संस्थापक: 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ (जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बनी) की नींव रखी। उनका उद्देश्य एक ऐसा राजनीतिक विकल्प तैयार करना था जो भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के मूल्यों पर आधारित हो।
अखंड भारत के पक्षधर: उनका प्रसिद्ध नारा— "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे"—कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए था। उन्होंने अनुच्छेद 370 के विरोध में देशव्यापी आंदोलन का नेतृत्व किया।
बलिदान का रहस्य: 1953 में, बिना परमिट लिए कश्मीर में प्रवेश करने के प्रयास में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। वहां जेल में ही रहस्यमय परिस्थितियों में 23 जून 1953 को उनका निधन हो गया। उनके बलिदान ने ही बाद में देश में कश्मीर को पूर्ण रूप से भारत का अभिन्न अंग बनाने के संकल्प को और मजबूत किया।
प्रखर वक्ता और संसद सदस्य: स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में वे उद्योग और आपूर्ति मंत्री थे। लेकिन, नेहरू-लियाकत समझौते (जो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाता था) के विरोध में उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। संसद में उनकी तर्कशक्ति और बहस करने की शैली का हर कोई लोहा मानता था।
