लखनऊ। भारतीय संस्कृति, शास्त्रीय संगीत, लोक परंपराओं और प्रदर्शन कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। राजधानी लखनऊ के काकराबाद में प्रस्तावित भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय का नया परिसर केवल एक संगीत विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और प्रदर्शन कलाओं का समग्र एवं विश्वस्तरीय केंद्र होगा। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को 'नादाधीनम् जगत्' की अवधारणा के अनुरूप विकसित किया जाएगा।

सोमवार को अपर मुख्य सचिव, संस्कृति, पर्यटन एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात की अध्यक्षता में आयोजित उच्चस्तरीय सलाहकार समिति की बैठक में देश के प्रतिष्ठित कलाकारों, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने नए परिसर की विस्तृत रूपरेखा पर मंथन किया। बैठक में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि यह परिसर आने वाले सौ वर्षों तक भारत की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रदर्शन कलाओं का प्रमुख वैश्विक केंद्र बने।
संस्कृति और आधुनिक तकनीक का होगा अनूठा संगम
बैठक में विशेषज्ञों ने कहा कि देश में ऐसा कोई संस्थान नहीं है, जहां शास्त्रीय संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक एवं जनजातीय कलाएं, दृश्य एवं ललित कला, साहित्य, दर्शन, योग, अध्यात्म और भारतीय ज्ञान प्रणाली का समन्वित अध्ययन एवं शोध एक ही परिसर में हो सके। इसी दृष्टि से नए परिसर को देश के पहले समग्र संस्कृति विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया।
परिसर में दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण, मौखिक परंपराओं के दस्तावेजीकरण, डिजिटल रिपॉजिटरी तथा भारतीय प्रदर्शन कलाओं के विश्वस्तरीय संग्रहालय की स्थापना भी प्रस्तावित है।
अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस होगा नया परिसर
नए कैंपस में आधुनिक शिक्षा और शोध को ध्यान में रखते हुए कई विशेष विद्यालय और अत्याधुनिक अधोसंरचनाएं विकसित की जाएंगी। इनमें—
- संगीत, नृत्य, रंगमंच, योग एवं अध्यात्म के विशेष विद्यालय
- दृश्य एवं ललित कला, साहित्य एवं दर्शन संकाय
- फिल्म निर्माण एवं सांस्कृतिक प्रबंधन संस्थान
- एआई म्यूजिक लैब और अत्याधुनिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो
- ध्वनि-विज्ञान आधारित अभ्यास कक्ष
- विष्णु नारायण भातखंडे ग्रैंड ऑडिटोरियम
- ब्लैक बॉक्स थिएटर
- शास्त्रीय नृत्य थिएटर
- रेसाइटल हॉल
- मुक्ताकाशी मंच
- सांस्कृतिक स्टार्टअप्स के लिए इनक्यूबेशन सेंटर
- मीडिया एवं कंटेंट लैब
- बौद्धिक संपदा (IP) सहायता केंद्र
जैसी विश्वस्तरीय सुविधाएं विकसित करने की योजना बनाई गई है।
पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने दिए महत्वपूर्ण सुझाव
लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने परिसर को भारतीय परंपरा और प्रकृति के अनुरूप विकसित करने का सुझाव दिया। उन्होंने व्यापक वृक्षारोपण, प्राकृतिक वातावरण, शिक्षकों के लिए आवासीय व्यवस्था, उत्तर भारतीय एवं कर्नाटक संगीत के समन्वय, उत्तर प्रदेश के पारंपरिक घरानों को संस्थान से जोड़ने, थिएटर कॉम्प्लेक्स, एग्जीबिशन हॉल, इंटरएक्टिव लर्निंग स्पेस तथा इंटीग्रेटेड नॉलेज सिस्टम आधारित विशेष प्रयोगशालाओं की स्थापना पर जोर दिया।
लोक कला से लेकर डिजिटल आर्ट्स तक मिलेगा स्थान
बैठक में पद्मश्री प्रो. वामन केंद्रे सहित अन्य विशेषज्ञों ने लोक एवं जनजातीय कलाओं, थिएटर, परफॉर्मिंग आर्ट्स, विजुअल आर्ट्स और साहित्य को एकीकृत पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की वकालत की। साथ ही डिजिटल आर्ट सेंटर की स्थापना तथा देश-विदेश के प्रतिष्ठित कलाकारों की नियमित सहभागिता सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया, ताकि विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद का केंद्र बन सके।
विश्वस्तरीय संस्थान बनाने का लक्ष्य
अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पास ऐसा विश्वस्तरीय सांस्कृतिक संस्थान विकसित करने का सुनहरा अवसर है, जो भारतीय संस्कृति की प्राचीन विरासत को संरक्षित करते हुए आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा और शोध उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का नया परिसर वास्तुकला, शैक्षणिक उत्कृष्टता और सांस्कृतिक वातावरण के माध्यम से भारतीयता का जीवंत अनुभव कराएगा।
उन्होंने बताया कि परियोजना के लिए राष्ट्रीय स्तर की आर्किटेक्चरल डिजाइन प्रतियोगिता आयोजित करने की योजना भी बनाई जा रही है। साथ ही डिजिटल आर्ट्स, एनीमेशन, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण, वर्चुअल प्रोडक्शन, म्यूजिक टेक्नोलॉजी, अंतर्विषयक शोध, सांस्कृतिक कूटनीति और भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे आधुनिक विषयों को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा।
परंपरा और तकनीक का बनेगा वैश्विक संगम
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह ने कहा कि नया परिसर भारतीय संस्कृति, संगीत और प्रदर्शन कलाओं के समग्र विकास का विश्वस्तरीय केंद्र बनेगा। यहां परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय के साथ विद्यार्थियों को उत्कृष्ट शिक्षा, शोध और नवाचार का वातावरण उपलब्ध कराया जाएगा।
बैठक में कुलसचिव एस.पी. सिंह, पद्मभूषण पं. अजय चक्रवर्ती, प्रो. श्रुति बंदोपाध्याय, पद्मश्री डॉ. शोवना नारायण, प्रो. अनुपम महाजन, पद्मविभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, पद्मश्री प्रो. वामन केंद्रे, प्रो. सिद्धार्थ सिंह तथा डॉ. वंदना सहगल सहित कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञ मौजूद रहे।
