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वाराणसी में भाईदूज पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया, बहनों ने परंपरागत रूप से कूटा गोधन

वाराणसी
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Kritika pandey
  • Updated: October 23, 2025

कैनविज टाइम्स, डिजिटल डेस्क । 

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी)में गुरुवार को कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर भाईदूज का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और उल्लासपूर्ण माहौल में मनाया गया। बहनों ने भाइयों के दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए व्रत रखा और पारंपरिक विधि से ‘गोधन कूटने’ की रस्म निभाई। जिले के शहरी इलाके, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में बहनों ने घरों के बाहर एवं गलियों में साफ-सफाई कर गोबर से गोधन चक्र बनाया। आयु चक्र में गूंग भटकइया सहित पूजन सामग्री रख उसे सजाया गया और परंपरा अनुसार बुजुर्ग महिलाओं की देखरेख में मूसल (ओखली) से गोधन कूटा गया। इस दौरान बहनों ने पारंपरिक गीत — “गोधन भइया चलले अहेरिया, खिलिच बहना दे लीं आशिष, जिउसहू मोरा भइया”  गाकर भाइयों की लंबी उम्र की कामना की। व्रत-पूजन के बाद बहनों ने गोधन चक्र पर रखे गूंग भटकइया के कांटे को अपनी जीभ से स्पर्श कर भाइयों की सलामती की प्रार्थना की। इसके बाद घर आकर भाइयों की आरती उतारी, तिलक लगाया और उन्हें मिठाई एवं प्रसाद खिलाया। बदले में भाइयों ने बहनों की रक्षा का संकल्प लिया और उपहार भेंट किए। त्योहार को लेकर शहर के बाजारों में विशेष रौनक रही। मिठाई और उपहार की दुकानों पर भीड़ उमड़ी रही। वहीं, कैंट स्टेशन, रोडवेज बस स्टैंड और निजी बस अड्डों पर मायके आने-जाने वाली विवाहित बहनों की चहल-पहल दिनभर बनी रही। स्थानीय परंपरा के अनुसार, गोवर्धन पूजा की बेदी पर बहनें मिठाई, चना और गूंग भटकइया का पौधा रखती हैं। पूजा से पूर्व इस पौधे को ‘श्राप’ देने की परंपरा है, किंतु मान्यता है कि पूजा के उपरांत यही श्राप ‘आशीर्वाद’ में बदल जाता है।

पौराणिक कथा से जुड़ी मान्यता

भाईदूज पर्व की उत्पत्ति सूर्यदेव की पत्नी छाया और उनकी संतान यमराज व यमुना से जुड़ी है। कथा के अनुसार, यमुना अपने भाई यमराज से बार-बार घर आने का आग्रह करती थीं, परंतु वे अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण टाल देते थे। एक दिन, कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज बहन के घर पहुंचे। यमुना ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और स्वादिष्ट भोजन कराया। प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना से वरदान मांगने को कहा। यमुना ने कहा कि आप हर वर्ष इस दिन मेरे घर आएं और जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करेगा, उसे आपके (यमराज के) भय से मुक्ति मिले। यमराज ने “तथास्तु” कहा और तभी से यह परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि जो भाई कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन अपनी बहन से टीका लगवाता है, उसे यमराज का भय नहीं रहता।

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