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लखनऊ में पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम का समापन, डॉ. बी. आर. मणि ने दिया व्याख्यान

लखनऊ विश्वविद्यालय में 12 दिवसीय पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम संपन्न। पद्मश्री डॉ. बी. आर. मणि ने Salvage Archaeology पर व्याख्यान दिया, प्रो. के. के. थपल्याल ने की अध्यक्षता।
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Shivam Srivastava
  • Updated: September 4, 2026

लखनऊ विश्वविद्यालय में पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम का गरिमापूर्ण समापन, डॉ. बी. आर. मणि ने Salvage Archaeology पर दिया व्याख्यान

लखनऊ। पुरातत्व एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति अभिरुचि, जागरूकता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा आयोजित 12 दिवसीय पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम का गुरुवार को समापन हुआ।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. बी. आर. मणि ने "Salvage Operations in Archaeology" विषय पर विशिष्ट एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। समारोह की अध्यक्षता प्रो. के. के. थपल्याल ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. एस. एन. कपूर उपस्थित रहे। यह जानकारी पुरातत्व निदेशक रेनू द्विवेदी ने दी।

Salvage Archaeology की आवश्यकता और प्रासंगिकता

मुख्य वक्ता डॉ. बी. आर. मणि ने अपने व्याख्यान में Salvage Archaeology की आवश्यकता एवं प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाँध, जलाशय, सड़क, रेलवे तथा अन्य विकास परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले पुरातात्त्विक स्थलों का समयबद्ध सर्वेक्षण, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, आवश्यकतानुसार उत्खनन तथा संरक्षण किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ किसी पुरातात्त्विक स्थल अथवा स्मारक को उसके मूल स्थान पर संरक्षित रखना संभव हो, वहाँ in-situ conservation को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। तथापि, अत्यंत विशेष एवं अपरिहार्य परिस्थितियों में, विशेषज्ञों की देखरेख में वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से स्मारकों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर पुनर्स्थापित किया जा सकता है।

नागार्जुनसागर, भाखड़ा बाँध और आलमपुर के उदाहरण

डॉ. मणि ने नागार्जुनसागर बाँध के कारण प्रभावित बौद्ध पुरावशेषों, भाखड़ा बाँध के कारण जलमग्न हुए बिलासपुर के 28 मंदिरों तथा आलमपुर के संगमेश्वर मंदिर के स्थानांतरण को Salvage Archaeology के महत्वपूर्ण उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किया। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने स्मारकों के विस्तृत दस्तावेजीकरण, स्थापत्य अवयवों के संरक्षण, क्रमबद्ध स्थानांतरण तथा पुनर्स्थापना की वैज्ञानिक प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक समझाया।

उन्होंने कहा कि विकास एवं सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के मध्य संतुलन स्थापित करना वर्तमान समय की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय पुरातात्त्विक एवं सांस्कृतिक विरासत से संबंधित पहलुओं को प्रारंभिक स्तर पर ही ध्यान में रखा जाना चाहिए।

ऑनलाइन माध्यम से पाठ्यक्रम में जुड़े प्रतिभागियों को उनके प्रमाण-पत्र ऑनलाइन लिंक के माध्यम से प्रेषित किए गए।

अतिथियों ने पाठ्यक्रम की सराहना की

विशिष्ट अतिथि प्रो. एस. एन. कपूर ने अपने उद्बोधन में पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक कार्यक्रम विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं सामान्य जनमानस में पुरातत्व तथा सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. के. के. थपल्याल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य वक्ता के व्याख्यान में प्रतिपादित महत्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख करते हुए Salvage Archaeology की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने पाठ्यक्रम के सफल आयोजन की सराहना करते हुए विभाग को बधाई दी तथा भविष्य में भी ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रमों के आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया।

समारोह में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. अनिल कुमार, प्रो. दुर्गेश कुमार श्रीवास्तव, सहायक आचार्य रश्मि सिंह तथा नवयुग कन्या महाविद्यालय की प्रो. संगीता शुक्ला सहित अन्य गणमान्यजन एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे।

आभार ज्ञापन

समापन अवसर पर विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने कार्यक्रम के सफल आयोजन में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से सहयोग प्रदान करने वाले सभी अतिथियों, वक्ताओं, विशेषज्ञों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. बी. आर. मणि, विशिष्ट अतिथि प्रो. एस. एन. कपूर तथा कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. के. के. थपल्याल के प्रति हृदयपूर्वक धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम का ऑनलाइन एवं ऑफलाइन संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव एवं श्री बलिहारी सेठ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। व्याख्यान के सचित्र प्रस्तुतीकरण में श्री अकील खान तथा कार्यक्रम के छायांकन का दायित्व आशीष कुमार द्वारा संभाला गया।

निष्कर्ष

इस प्रकार 12 दिवसीय पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम का समापन सार्थक एवं ज्ञानवर्धक शैक्षणिक सत्र के साथ हुआ। पाठ्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को पुरातत्व के विविध पक्षों, पुरातात्त्विक विरासत के संरक्षण तथा विकास परियोजनाओं के संदर्भ में Salvage Archaeology की भूमिका को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ।

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