लखनऊ से कोलकाता का राब्ता स्क्रीन पर नजर आया
लखनऊ। 17वें महिंद्रा सनतकदा लखनऊ फेस्टिवल के लिए कर्टेन रेजर के तहत राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में चल रहे दो दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन चार फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान लखनऊ से कोलकाता का राब्ता थीम पर बातचीत भी हुई। दूसरे दिन का उद्घाटन अमित मुखर्जी और सनतकदा फिल्म टीम ने किया। पहले सत्र में लखनऊ और कोलकाता के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सिनेमा व साहित्य, अभिजात वर्ग की दुनिया और संगीत से लेकर कहानी कहने के तरीकों पर चर्चा की गई। इससे पहले सुबह की शुरुआत एशान शर्मा के नेतृत्व में रेजिडेंसी वॉक से हुई, जो सत्यजीत रे की प्रसिद्ध फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी का हिस्सा भी है। सर्द सुबह में शहर के कई इतिहासप्रेमी इस वॉक में शामिल हुए। इस अवसर पर एक परिचर्चा में एशान शर्मा ने कहा कि लखनऊ की कहानियों को सिनेमा में अक्सर हाशिये पर रखा गया, जबकि कोलकाता पर कई फिल्में बनती रहीं। उमराव जान जैसी फिल्में लखनऊ से अलग नहीं की जा सकतीं, क्योंकि यह शहर कहानी के केंद्र में है। रिशाद रिज़वी ने कहा कि अब लखनऊ में फिल्म निर्माण बढ़ा है क्योंकि यहां बेहतर कनेक्टिविटी, होटल और सस्ती लोकेशंस उपलब्ध हैं। छोटे शहर अब सिनेमाई नक्शे पर मजबूती से उभर रहे हैं। फिल्म जलसाघर में बेगम अख्तर का गीत
दूसरे दिन की पहली स्क्रीनिंग में दिखाई गई 1958 में प्रदर्शित फिल्म जलसाघर। सत्यजीत रे की यह कालजयी बांग्ला फिल्म तराशंकर बंद्योपाध्याय की लघुकथा पर आधारित है जिसमें सामंती व्यवस्था के साथ ही बेगम अख्तर का गाया मशहूर गीत भर भर आईं मोरी अंखियाँ पिया बिन... भी सुनने को मिला।
अन्वेषा में लखनऊ से कोलकाता तक की सांस्कृतिक यात्रा
संगमित्रा सरकार की फिल्म अन्वेषा में लखनऊ से कोलकाता तक की सांस्कृतिक यात्रा दिखी। इसमें वाजिद अली शाह के कोलकाता निर्वासन और उनके साथ करीब तीन सौ बाइयों व दरबारी कलाकारों के विस्थापन की कहानी है। यही वह दौर था जब ख़याल, ठुमरी और कथक की परंपराएं कोलकाता के भद्रलोक समाज में समाहित हुईं। अनिंद्य बनर्जी के संगीत निर्देशन में सजी फिल्म में गिरिजा देवी, उस्ताद अली अकबर खां, गौहर जान और बेगम अख्तर जैसे दिग्गज कलाकारों की विरासत को एक साथ पिरोया।
शतरंज के खिलाड़ी में दिखी अवध की दरबारी दुनिया
अंत में दिखाई गई 1977 में प्रदर्शित सत्यजीत रे की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी, जो प्रेमचंद की कहानी पर आधारित है। फिल्म 1856 के लखनऊ को चित्रित करती है, जहां मिर्ज़ा सज्जाद अली (संजीव कुमार) और मिर्जा रौशन अली (सईद जाफरी) अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार के बीच अपनी बिसात में उलझे रहते हैं, जबकि जनरल आउट्राम (रिचर्ड एटनबरो) नवाब वाजिद अली शाह (अमजद खान) से अवध छीन लेता है। रे ने इस फिल्म में अवध की दरबारी दुनिया को जीवंत किया है।
