डिजिटल डेस्क, लखनऊ। अगर किसी देश को नष्ट करना है तो उसकी सांस्कृतिक पहचान को खत्म कर दो, क्योंकि एक देश अपनी पहचान से जुड़ा होता है। भारत पर हमले करने वाले विदेशी आक्रांताओं ने यही तरीका अपनाया। इस्लामी आक्रांताओं ने न केवल भारत की धन-संपत्ति लूटी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर मंदिरों और धार्मिक स्थलों को तोड़कर मस्जिदें बना दीं। यही नहीं, अंग्रेजों का भी लक्ष्य भारत को कमजोर करके यहां के संसाधनों का शोषण करना था। इसलिए उन्होंने भी भारत की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने के लिए हर संभव प्रयास किए।
आक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए धार्मिक स्थल सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक थे। इन बिना, भारत की पहचान अधूरी होती। अयोध्या, काशी और मथुरा इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जहां पर सांस्कृतिक पहचान को पुनः प्राप्त करने के प्रयास किए गए।
सैकड़ों वर्षों की गुलामी और संघर्ष के बाद, अब सनातन संस्कृति का पुनरुद्धार हो रहा है। काशी, मथुरा, संभल और अजमेर दरगाह जैसे स्थानों पर अब साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीकों को पुनः प्राप्त करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को फिर से सम्मान मिल रहा है।
