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पत्थरों में रचा राम, तप में गढ़ा मंदिर: 25 साल की साधना का अद्भुत उदाहरण

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के बिहारी लाल ने 25 वर्षों तक सुंदरनगर के हनुमान मंदिर निर्माण में 28,000 पत्थरों पर 'राम' नाम उकेरा। अब मंदिर पूर्ण होने पर उनकी आंखें भर आईं। लोग उन्हें राजमिस्त्री नहीं, संत मानते हैं।
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Kritika pandey
  • Updated: May 29, 2025

कैनविज टाइम्स, डिजिटल डेस्क । 

गोहर उपमंडल की गवाड़ पंचायत निवासी 53 वर्षीय राजमिस्त्री बिहारी लाल ने भक्ति और समर्पण की अनूठी मिसाल पेश की है। उन्होंने 25 वर्षों तक लगातार सुंदरनगर उपमंडल की महादेव पंचायत के वीर हनुमान मंदिर निर्माण में अपना जीवन समर्पित किया। इस दौरान उन्होंने 28,000 पत्थरों पर ‘राम’ नाम उकेरा। इस कार्य की शुरुआत 17 सितंबर 2000 को एक छोटे से काम के रूप में हुई थी, जब उन्हें मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों पर 'राम' नाम लिखने का काम सौंपा गया। शुरुआत में उन्हें मात्र 150 रुपये की दिहाड़ी मिलती थी, जो बाद में बढ़कर 1000 रुपये हो गई। परंतु उनके लिए यह काम केवल रोजगार नहीं, बल्कि भक्ति बन गया।हर सुबह वह एक ही संकल्प के साथ उठते  आज एक और पत्थर पर 'राम' लिखना है। हथौड़ी, छेनी, धूल और धूप उनके जीवन का हिस्सा बन गए। वर्षों की इस साधना में उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली, न कोई शिकायत की। बुधवार को जब मंदिर की छत पर अंतिम गुंबद रखा गया, तो "जय श्रीराम" के उद्घोष के बीच भीड़ में एक कोना ऐसा था जहां बिहारी लाल चुपचाप आंखें पोंछ रहे थे। उनका कहना था 25 साल तक इन पत्थरों से बात की है। अब ये पत्थर मेरी आत्मा पर भी खुद चुके हैं। बिहारी लाल के इस तप में उनका बेटा ललित कुमार भी सहभागी बन गया। वर्षों बाद उसने भी पिता के साथ हथौड़ी-छेनी उठाकर इस रामकाज में साथ देना शुरू किया। इस मंदिर का निर्माण शंकराचार्य शैली में किया गया है और इसके पत्थर विशेष रूप से सुंदरनगर की कपाही पंचायत से लाए गए थे। इन्हें बिहारी लाल खुद चुनते और तराशते थे। मंदिर निर्माण में श्री हनुमान मंदिर सेवा समिति के प्रधान पदम सिंह ठाकुर, उप प्रधान खूब राम, महासचिव चमन ठाकुर सहित अनेक स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पदम सिंह ठाकुर ने कहा अगर पत्थर में राम हैं तो उसमें बिहारी लाल की आत्मा भी बसती है। उनकी भक्ति ही असली मंदिर बनाती है। यह मंदिर कभी एक साधु द्वारा एक पेड़ के नीचे स्थापित मूर्ति से शुरू हुआ था। अब यह भव्य मंदिर श्रद्धा, सेवा और तपस्या की जीवंत मिसाल बन चुका है।

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