कैनविज टाइम्स, डिजिटल डेस्क ।
देशभर में फैले देवी मंदिरों में मां कामाख्या मंदिर का विशेष महत्व है। असम की राजधानी गुवाहाटी से मात्र 8 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां देवी सती का योनिभाग गिरा था, इसलिए यह मंदिर शक्ति और सृजन का प्रतीक माना जाता है। खास बात यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि गर्भगृह में स्थित प्राकृतिक योनिकुंड की पूजा की जाती है। कामाख्या मंदिर नवरात्र के समय श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को आकर्षित करता है। यहां तंत्र साधना का भी विशेष महत्व है और मंदिर परिसर में देवी के दस रूपों के दस महाविद्या मंदिर भी मौजूद हैं। हर साल यहां अंबुबाची मेले का आयोजन होता है, जिसे देवी के मासिक धर्म का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान मंदिर के पट तीन दिनों तक बंद रहते हैं और चौथे दिन लाखों श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इतिहास की बात करें तो माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कामदेव ने विश्वकर्मा की सहायता से करवाया था। हालांकि, मंदिर का प्रारंभिक इतिहास रहस्यमय और किंवदंतियों से भरा हुआ है। बाद में राजा नरका के शासन में इस मंदिर का महत्व पुनः स्थापित हुआ। मंदिर की वास्तुकला भी बेहद अद्भुत है। लाल गुंबद, नक्काशीदार दीवारें और शांत वातावरण यहां की उत्तर-पूर्वी मध्यकालीन शैली की झलक देते हैं।
कैसे पहुंचे?
हवाई मार्ग: गुवाहाटी एयरपोर्ट नजदीकी हवाई अड्डा है, जो देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
रेल मार्ग: कामाख्या रेलवे स्टेशन सबसे निकट है, जहां से टैक्सी या ऑटो आसानी से मिल जाते हैं।
सड़क मार्ग: गुवाहाटी से मंदिर तक सड़क मार्ग अच्छी तरह से जुड़ा है और टैक्सी, बस, ऑटो की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
नवरात्र जैसे पावन पर्व पर मां कामाख्या के दर्शन करने से विशेष फल की प्राप्ति मानी जाती है। श्रद्धालु यहां आकर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं।
