कैनविज टाइम्स,डिजिटल डेस्क। बिहार में बीपीएससी (Bihar Public Service Commission) कैंडिडेट्स पर पुलिस द्वारा लाठियां बरसाए जाने से राजनीतिक माहौल गरमा गया है। यह घटना उस समय हुई जब बीपीएससी के अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर पटना में प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारी कैंडिडेट्स ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार और बीपीएससी ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया है, और उनकी मांगों को अनदेखा किया जा रहा है। इस विरोध प्रदर्शन को लेकर बिहार की सियासत में हलचल मच गई है, और विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर आरोपों की बौछार कर दी है।
क्या था मामला?
बीपीएससी कैंडिडेट्स ने अपनी कई लंबित मांगों को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। इन मांगों में बीपीएससी द्वारा किए गए परीक्षा परिणामों में सुधार, साक्षात्कार प्रक्रिया में पारदर्शिता और अन्य प्रशासनिक सुधार शामिल थे। अभ्यर्थियों का आरोप था कि राज्य सरकार और बीपीएससी ने उनका शोषण किया है और उनकी मांगों को नजरअंदाज किया है।विरोध प्रदर्शन के दौरान, जब कैंडिडेट्स ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज़ उठानी शुरू की, तब पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया। इस लाठीचार्ज में कई अभ्यर्थी घायल हो गए, और स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
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राजनीतिक प्रतिक्रिया:
इस घटना के बाद बिहार की राजनीति गरमा गई। विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने पुलिस कार्रवाई को "अत्याचार" और "लोकतंत्र की हत्या" करार दिया। उन्होंने बिहार सरकार से इस कृत्य की कड़ी निंदा की और इस पर जवाब देने की मांग की । वहीं, सत्ताधारी जेडीयू और बीजेपी के नेताओं ने इसे कानून-व्यवस्था का मामला बताते हुए कहा कि प्रदर्शनकारी अभ्यर्थी सरकार की ओर से दिए गए अवसरों का सही इस्तेमाल नहीं कर रहे थे।
"एक और एक ग्यारह" क्या है?
इस मामले पर राजनीति में एक और दिलचस्प मोड़ आया, जब तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए "एक और एक ग्यारह" की बात की। उन्होंने कहा कि अगर नीतीश कुमार इस मामले पर सही जवाब नहीं देंगे, तो उनकी सरकार के दिन "ग्यारह" होंगे। यह बयान राजनीतिक रूप से काफी चर्चित हुआ और सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। बीपीएससी कैंडिडेट्स के खिलाफ पुलिस की लाठीचार्ज और इसके बाद की राजनीति बिहार की सियासत में एक नया विवाद पैदा कर चुकी है। इस पूरे मामले ने जहां प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, वहीं यह भी दिखा दिया कि बिहार में रोजगार और सरकारी नौकरियों को लेकर युवा वर्ग के बीच असंतोष गहराता जा रहा है। अब यह देखना होगा कि बिहार सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है और क्या अभ्यर्थियों की मांगें पूरी होती हैं।
