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बीबीएयू में हिंदी उत्सव-2026 का समापन: विज्ञान-रोजगार की भाषा बने हिंदी

लखनऊ के बीबीएयू में राजभाषा हिंदी उत्सव-2026 का समापन। मानवेन्द्र सिंह बोले, हिंदी को AI, क्वांटम तकनीक और रोजगार से जोड़ना होगा।
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Shivam Srivastava
  • Updated: October 3, 2026

हिंदी साहित्य से आगे बढ़कर विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा बने: मानवेन्द्र सिंह

बीबीएयू में राजभाषा हिंदी उत्सव-2026 का समापन, विजेताओं को प्रमाण-पत्र, पदक और पुरस्कार राशि

लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में हिंदी प्रकोष्ठ की ओर से आयोजित राजभाषा हिंदी उत्सव-2026 का सोमवार को समापन हुआ। मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति मानवेन्द्र सिंह ने कहा कि हिंदी को साहित्य के साथ-साथ विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा के रूप में विकसित करना समय की जरूरत है।

समारोह की अध्यक्षता कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने की। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं सांसद डॉ. अशोक बाजपेई, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी के प्रो. मुन्ना तिवारी, कुलसचिव डॉ. अश्विनी कुमार सिंह और कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि से हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय का कुलगीत गाया गया। आयोजन समिति ने अतिथियों को अंगवस्त्रम और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।

"हिंदी को AI, क्वांटम तकनीक और रोजगार से जोड़ना होगा"

मुख्य अतिथि मानवेन्द्र सिंह ने कहा कि किसी राष्ट्र की भाषा उसके सोचने के तरीके को व्यक्त करती है और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संवाद का सशक्त माध्यम बनती है। उन्होंने कहा कि हिंदी की समृद्धि केवल साहित्यिक परंपरा में नहीं, बल्कि उसकी बोलियों और भाषाई विविधता में भी है। इसलिए साहित्यिक विरासत के साथ बोलियों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिस भाषा में साहित्य तो हो, पर रोजगार, ज्ञान और विज्ञान से जुड़ी पर्याप्त सामग्री और अवसर न हों, वह नई पीढ़ी से प्रभावी ढंग से नहीं जुड़ पाती। इसलिए हिंदी को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम तकनीक, विज्ञान, डिजिटलीकरण और रोजगार से जोड़ना होगा। उनके अनुसार हिंदी को अतीत की भाषा तक सीमित रखने के बजाय भविष्य की सशक्त भाषा के रूप में विकसित करना जरूरी है।

हिंदी के साथ एक और भारतीय भाषा पढ़ने पर जोर

डॉ. अशोक बाजपेई ने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आचार-विचार और भावनाओं की अभिव्यक्ति की भाषा है। भाषाई विवादों से बचने और भारतीय भाषाओं में समन्वय बनाने के लिए उन्होंने सुझाव दिया कि शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी के साथ कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा के अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने हिंदी के वैज्ञानिक प्रयोग को बढ़ावा देने की भी बात कही।

कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने कहा कि भारत की पहचान उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में है। हिंदी को आगे बढ़ाने के साथ अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान भी जरूरी है। एक से अधिक भारतीय भाषाएं जानने से संवाद का दायरा बढ़ता है और अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृति, साहित्य और जीवन-मूल्यों को समझने का मौका मिलता है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा, रोजगार, संचार और व्यावसायिक क्षेत्रों में हिंदी का उपयोग लगातार बढ़ रहा है।

प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि हिंदीभाषी होने के बावजूद हम हिंदी को वह प्रतिष्ठा नहीं दिला पा रहे हैं, जिसकी वह हकदार है, और इस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हिंदी ने राष्ट्रीय चेतना के विकास और विभिन्न क्षेत्रों व समुदायों के बीच संवाद में अहम भूमिका निभाई है। इसके प्रचार-प्रसार में कई गैर-हिंदीभाषी विद्वानों का भी योगदान रहा है। उन्होंने हिंदी की सहभाषाओं और अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान और सह-अस्तित्व पर जोर दिया।

प्रतियोगिताओं के विजेता सम्मानित

बीबीएयू में 1 से 30 सितंबर 2026 तक राजभाषा हिंदी उत्सव के तहत श्रुतिलेख (सु-लेख), टिप्पणी एवं प्रारूपण, हिंदी टंकण, निबंध लेखन और स्वरचित कविता पाठ जैसी प्रतियोगिताएं हुईं। समापन समारोह में मुख्य अतिथि ने विजेताओं को प्रमाण-पत्र, पदक और पुरस्कार राशि देकर सम्मानित किया।

पुस्तक का विमोचन और राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

कार्यक्रम में डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव की पुस्तक 'लोकसाहित्य के विविध परिदृश्य' का विमोचन भी हुआ। इसी दौरान 'हिंदी के विकास में बोलियों का योगदान: वर्तमान परिप्रेक्ष्य एवं भविष्य की दिशा' विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी समापन हुआ। यह संगोष्ठी बीबीएयू के हिंदी प्रकोष्ठ, हिंदुस्तानी एकेडमी (उत्तर प्रदेश, प्रयागराज) और अखिल भारतीय साहित्य परिषद (अवध प्रांत) के संयुक्त तत्वावधान में हुई।

आईक्यूएसी निदेशक प्रो. शिल्पी वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया और मंच संचालन डॉ. रमेश चंद्र नैलवाल ने किया। कार्यक्रम में हिंदी विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. रामपाल गंगवार, डॉ. नमिता जैसल, अन्य संकायों के अध्यक्ष, शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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