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लखनऊ: कानून और विज्ञान का संगम है फोरेंसिक साइंस: डॉ. गोस्वामी

लखनऊ के यूपी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में पीसीएस 2025 बैच के 38 प्रशिक्षु अधिकारियों ने भ्रमण किया। डॉ. जीके गोस्वामी ने मृत्यु-कालिक बयान पर दी जानकारी।
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Shivam Srivastava
  • Updated: October 7, 2026

"कानून और विज्ञान का संगम ही फोरेंसिक विज्ञान": लखनऊ में पीसीएस प्रशिक्षु अधिकारियों से बोले डॉ. जीके गोस्वामी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में मंगलवार को प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) 2025 बैच के 38 प्रशिक्षणाधीन अधिकारियों ने संस्थान का भ्रमण किया। इस दौरान प्रशिक्षु अधिकारियों ने संस्थान की डीएनए लैब और ड्रोन लैब का अवलोकन किया तथा फॉरेंसिक जांच की आधुनिक तकनीकों और उनकी कार्यप्रणाली की जानकारी प्राप्त की।

"फॉरेंसिक एक विजन है"

संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जीके गोस्वामी ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि फॉरेंसिक साइंस के माध्यम से सच्चाई को वैज्ञानिक रूप से कानून के समक्ष लाकर न्याय दिलाने में सहयोग करना संस्थान का मूल उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि फील्ड में सिविल सेवा का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण है, जिसमें त्याग और समर्पण की आवश्यकता होती है। अधिकारियों को मानसिक रूप से हर समय विषम परिस्थितियों से जूझने के लिए तैयार रहना चाहिए।

डॉ. गोस्वामी ने कहा कि कानून और विज्ञान का संगम ही फॉरेंसिक विज्ञान है और फॉरेंसिक एक विजन है। उन्होंने नए कानूनों के संदर्भ में न्याय, सत्य और साक्ष्य के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

डिजिटल और भौतिक फुटप्रिंट पर जोर

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में फॉरेंसिक विज्ञान का महत्व लगातार बढ़ रहा है। साइबर और फॉरेंसिक तकनीक हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं, क्योंकि आधुनिक तकनीक पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। हम जहां भी जाते हैं, वहां किसी न किसी रूप में अपना डिजिटल या भौतिक फुटप्रिंट छोड़ते हैं।

मृत्यु-कालिक बयान पर दी विस्तृत जानकारी

डॉ. गोस्वामी ने प्रशिक्षु अधिकारियों को मृत्यु-कालिक बयान के संबंध में भी विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि यदि पीड़ित का बयान तत्काल दर्ज न किया जाए तो उसकी मृत्यु हो सकती है और अपराध से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी साक्ष्य के लोप की आशंका रहती है। ऐसी स्थिति में बयान दर्ज करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

उन्होंने बताया कि पुलिस अथवा चिकित्सक की सूचना पर मजिस्ट्रेट को पीड़ित का बयान उसकी अपनी भाषा में दर्ज करना चाहिए, जो कानूनी रूप से ग्राह्य होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि संभव हो तो बयान के समय डिजिटल रिकॉर्डिंग भी कराई जाए। यदि पीड़ित बोलने में सक्षम नहीं है, लेकिन लिखकर अपनी बात बता सकता है, तो उसका लिखित बयान भी मृत्यु-कालिक बयान के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

संस्थान की गतिविधियों की दी जानकारी

इस अवसर पर संस्थान के अपर निदेशक संजीव सुमन ने सभागार में उपस्थित प्रशिक्षु अधिकारियों को संस्थान की गतिविधियों, प्रशिक्षण एवं विभिन्न प्रयोगशालाओं के बारे में जानकारी दी।

कार्यक्रम में अपर पुलिस अधीक्षक चिरंजीब मुखर्जी, अतुल यादव, पलक अनेजा, सेंथिल शिव सुब्रमण्यम, जनसंपर्क अधिकारी संतोष कुमार तिवारी, आरआई शैलेंद्र सिंह सहित संस्थान के शैक्षणिक संवर्ग के संकाय सदस्य उपस्थित रहे।

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