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बीबीएयू शोध: 50 वर्षों में डिजिटल संरक्षण बना पुस्तकालय अनुसंधान का केंद्र

बीबीएयू लखनऊ के शोधछात्र विक्रांत दुबे व प्रो. शिल्पी वर्मा का शोध पत्र प्रकाशित, जिसमें AI/ML से 1974-2024 के पुस्तकालय अनुसंधान का विश्लेषण किया गया।
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Shivam Srivastava
  • Updated: September 7, 2026

बीबीएयू के शोध में पचास वर्षों के पुस्तकालय अनुसंधान का विश्लेषण: डिजिटल संरक्षण सबसे प्रमुख विषय

लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग के शोधछात्र विक्रांत दुबे तथा सूचना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो. शिल्पी वर्मा का एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ है। इस शोध में मशीन लर्निंग की सहायता से यह पता लगाया गया है कि पिछले पाँच दशकों में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान का अनुसंधान वास्तव में किन विषयों पर केंद्रित रहा है। शोधकर्ताओं ने कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल के सहयोग एवं प्रोत्साहन के प्रति आभार व्यक्त किया, जिनका व्यावहारिक उपयोगिता वाले शोध पर बल इस कार्य की दिशा तय करने में सहायक रहा।

प्रतिष्ठित जर्नल में हुआ प्रकाशन

यह शोध पत्र DESIDOC Journal of Library & Information Technology के सितम्बर 2026 अंक (खंड 46, अंक 5, पृष्ठ 569–576) में प्रकाशित हुआ है। स्कोपस/स्किमागो सूची में यह पत्रिका पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान श्रेणी की Q2 पत्रिका है, जो Scopus, Web of Science (ESCI), Dimensions, LISA, LISTA, EBSCO, ProQuest, Indian Citation Index तथा Google Scholar में अनुक्रमित है।

LDA तकनीक से निकले पाँच प्रमुख विषय-समूह

शोधकर्ताओं ने 1974 से 2024 के बीच प्रकाशित 279 स्कोपस-अनुक्रमित प्रकाशनों पर लेटेंट डिरिशले एलोकेशन (LDA) तकनीक लागू की और पाँच प्रमुख विषय-समूह प्राप्त किए:

  • डिजिटल संरक्षण एवं पुस्तकालय सूचना विज्ञान — लगभग 30%
  • बिब्लियोमेट्रिक अनुसंधान — लगभग 20%
  • डिजिटल पुस्तकालय सेवाएँ — लगभग 20%
  • ऑनलाइन शिक्षण — लगभग 20%
  • उभरते रुझान — शेष 10%

प्रकाशन गतिविधि 1995 से पहले सीमित थी, 2000 के बाद बढ़ी और 2015 से 2020 के बीच अपने उच्चतम स्तर पर पहुँची — यही वह कालखंड है जब एनडीएलआई और ई-शोधसिंधु की शुरुआत हुई।

व्यावहारिक निहितार्थ: क्या करना चाहिए भारतीय पुस्तकालयों को

अध्ययन में इन निष्कर्षों के व्यावहारिक निहितार्थ भी बताए गए हैं। लेखकों के अनुसार संरक्षण संबंधी शोध की यह प्रमुखता दर्शाती है कि भारतीय पुस्तकालयों को:

  • OAIS और PREMIS जैसे वैश्विक मानकों तथा वितरित संरक्षण प्रतिरूपों को अपनाना चाहिए
  • डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ करना चाहिए
  • मेटाडेटा की गुणवत्ता सुधारनी चाहिए
  • दीर्घकालिक अभिलेखीय रणनीतियाँ अपनानी चाहिए

बिब्लियोमेट्रिक तथा डिजिटल सेवा संबंधी विषयों की निरंतर उपस्थिति यह भी स्पष्ट करती है कि डेटा एनालिटिक्स, टेक्स्ट माइनिंग, विज़ुअलाइज़ेशन उपकरणों और डिजिटल सेवा संचालन में व्यावसायिक क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है। लेखकों का सुझाव है कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ मुक्त पहुँच प्रकाशन, डिजिटल संरक्षण तथा संगणकीय रूप से समृद्ध पुस्तकालय सेवाओं में सहायक होंगी।

भारत बनाम वैश्विक अभ्यास: कहाँ पिछड़ रहा है भारत

भारतीय और वैश्विक अभ्यास की तुलना करते हुए शोध पत्र बताता है कि विदेशों में संरक्षण कार्य LOCKSS जैसी सहयोगी परियोजनाओं, OAIS आधारित मानकों तथा यूरोप की प्लान एस से संचालित होता है, और अब फ़ाइल क्षरण का पूर्वानुमान लगाने तथा स्वतः मेटाडेटा तैयार करने वाले AI उपकरणों का प्रयोग भी बढ़ रहा है।

भारत ने एनडीएलआई की व्यापक डिजिटलीकरण परियोजनाओं, इनफ्लिबनेट के शोधगंगा जैसे संस्थागत भंडारों तथा रक्षा पुस्तकालयों की सुरक्षित अभिलेखीय प्रणालियों के माध्यम से प्रगति की है, किन्तु AI आधारित संरक्षण, स्वचालन और उन्नत एनालिटिक्स यहाँ अभी नए हैं।

बिब्लियोमेट्रिक्स के संदर्भ में भी लेखकों का निष्कर्ष है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑल्टमेट्रिक्स, नेटवर्क विज़ुअलाइज़ेशन और एल्गोरिदमिक मैपिंग का प्रयोग हो रहा है, जबकि भारतीय शोध मुख्यतः वर्णनात्मक बना हुआ है। डिजिटल सेवाओं में स्वयं (SWAYAM) और ई-शोधसिंधु जैसे मंच उपलब्ध हैं, पर लर्निंग एनालिटिक्स का समावेश बहुत कम है।

सबसे छोटा विषय-समूह क्षेत्र की अग्रिम दिशाओं से जुड़ा है — जिसमें ब्लॉकचेन आधारित डिजिटल अधिकार प्रबंधन, AI सहायित सूचीकरण, AR/VR अनुप्रयोग तथा स्मार्ट पुस्तकालय अवसंरचना शामिल हैं।

विभाग में बधाइयों का दौर

इस अवसर पर विभाग के अन्य शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भी शोधछात्र विक्रांत दुबे तथा प्रो. शिल्पी वर्मा को इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

 

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