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भारतीय भाषाओं को ज्ञान की भाषा बनाने पर जोर, BBAU कार्यशाला समापन

बीबीएयू लखनऊ में भारतीय भाषा पुस्तक योजना पर आयोजित द्विदिवसीय कार्यशाला संपन्न, विशेषज्ञों ने भारतीय भाषाओं को शिक्षा-शोध की सशक्त भाषा बताया।
  • By Kanhwizz Times
  • Reported By: Shivam Srivastava
  • Updated: September 10, 2026

भारतीय भाषाओं को ज्ञान, शोध और शिक्षा की सशक्त भाषा बनाने पर जोर, बीबीएयू में कार्यशाला का समापन

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) में विश्वविद्यालय एवं भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में 'भारतीय भाषा पुस्तक योजना के राज्य स्तरीय क्रियान्वयन' विषय पर आयोजित द्विदिवसीय कार्यशाला का समापन हुआ।

समापन सत्र में काशी विद्यापीठ, बनारस के प्रो. नरेंद्र नारायण, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय, भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस के प्रो. शैलेश मिश्रा, जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज, महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मुख्य रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में प्रो. उदयन मिश्र ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्य और रूपरेखा से अवगत कराया।

"निज भाषा उन्नति अहै" — भाषा के महत्व पर प्रो. नरेंद्र नारायण का संबोधन

काशी विद्यापीठ, बनारस के प्रो. नरेंद्र नारायण ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध पंक्तियों का हवाला देकर मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान, ज्ञान-विकास और सामाजिक चेतना में उसकी भाषा की केंद्रीय भूमिका होती है। उन्होंने दुनिया भर में हिंदी के प्रचार-प्रसार और अध्ययन-अध्यापन के प्रयासों की चर्चा करते हुए इसकी वैश्विक स्वीकार्यता पर प्रकाश डाला, साथ ही मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह 'दिनकर', भारतेन्दु हरिश्चंद्र और मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों का उल्लेख किया जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ-साथ समाज में राष्ट्रीय चेतना भी जगाई। प्रो. नारायण के अनुसार हिंदी को अब केवल साहित्य और संवाद तक सीमित न रखकर शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन की सशक्त भाषा के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत: डॉ. चंदन श्रीवास्तव

भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने बताया कि इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा की ओर पुनः लौटकर उस पर गंभीरता से कार्य करना है। उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा में शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, गणित, दर्शन, कला और जीवन मूल्यों से जुड़ा व्यापक ज्ञान समाहित है, जिसे भारतीय भाषाओं के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना और आधुनिक संदर्भों में विकसित करना आज की जरूरत है। डॉ. श्रीवास्तव के मुताबिक भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों का निर्माण भाषा-संरक्षण के साथ-साथ विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।

निज भाषा से ही संभव है वास्तविक प्रगति: प्रो. सुषमा पाण्डेय

दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय ने कहा कि कोई भी देश अपनी भाषा के माध्यम से ही वास्तविक और व्यापक प्रगति कर सकता है, क्योंकि भाषा ही ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम है। उन्होंने भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा तथा वैदिक शिक्षा एवं योग परंपरा के वैश्विक प्रभाव का जिक्र करते हुए 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तक भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में हुए प्रावधानों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भारतीयकरण के साथ अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा और भाषाओं को शिक्षा के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबका दायित्व है।

डिजिटलाइजेशन से मिलेगी भारतीय भाषाओं को नई पहचान: प्रो. शैलेश मिश्रा

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस के प्रो. शैलेश मिश्रा ने कहा कि डिजिटलाइजेशन के माध्यम से भारतीय भाषाओं को व्यापक स्तर पर नई पीढ़ी से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने ई-बुक्स, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन पाठ्य सामग्री, ऑडियो-वीडियो कंटेंट और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारतीय भाषाओं में ज्ञान के प्रसार का प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि तकनीक के जरिए भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण एवं समकालीन सामग्री का निर्माण, अनुवाद और प्रसार होना चाहिए, ताकि विद्यार्थी और युवा वर्ग अपनी भाषा में सहजता से ज्ञान प्राप्त कर सकें।

शोध को समाज से जोड़ने की जरूरत: डॉ. अजय मिश्रा

जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज, महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा ने पूर्व और वर्तमान शोध कार्यों की प्रकृति में आए बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शोध का मूल उद्देश्य समाज की वास्तविक समस्याओं को समझना, उनके कारण खोजना और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना होना चाहिए। उनके अनुसार वही शोध सार्थक माना जा सकता है, जिसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उन्होंने हिंदी भाषा में शोध कार्यों को बढ़ावा देने की भी वकालत की और कहा कि हिंदी को केवल संचार की भाषा तक सीमित न रखकर ज्ञान, अनुसंधान और अकादमिक विमर्श की सशक्त भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

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