सैन्य अस्पताल मेरठ और शकुंतला विश्वविद्यालय की संयुक्त कार्यशाला: दिव्यांगों के लिए बनेगी व्यावहारिक शिक्षा नीत
दिव्यांगता के क्षेत्र में काम कर रहे विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के लिए मेरठ में एक अहम पहल देखने को मिली। सैन्य अस्पताल, मेरठ और डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के संयुक्त सहयोग से Joint Collaborative Training Cum Screening Camp–2026 के तहत एक विशेष क्षमता निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई। सैन्य अस्पताल मेरठ के कॉन्फ्रेंस हॉल में हुई इस कार्यशाला में दिव्यांगता की प्रारंभिक पहचान, स्क्रीनिंग, मूल्यांकन, हस्तक्षेप और पुनर्वास जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने गहन जानकारी दी।
कार्यक्रम का मकसद साफ था — दिव्यांगता के अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों की क्षमता बढ़ाना और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समन्वित, समावेशी व व्यक्ति-केंद्रित सेवाओं को और बेहतर बनाना। इस दौरान चिकित्सा, विशेष शिक्षा, पुनर्वास और सहायक सेवाओं से जुड़े कई पहलुओं पर व्यावहारिक चर्चा हुई।
वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम में ब्रिगेडियर एस.के. सिंह (Dy GOC PUPSA & Station Commander) मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। उनके साथ ब्रिगेडियर सी.पी. सिंह (कमांडेंट, मिलिट्री हॉस्पिटल मेरठ), कर्नल अशोक कुमार (वरिष्ठ रजिस्ट्रार), कर्नल एम.एस. भदौरिया (कर्नल एडमिन) और कर्नल रचित शर्मा समेत कई वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत स्वागत संबोधन और दीप प्रज्ज्वलन के साथ की गई।
दृष्टिबाधिता और लो विजन पर हुआ विशेष सत्र
दृष्टिबाधिता और लो विजन पर आधारित सत्र डॉ. आशीष कुमार गुप्ता और नीरज दीक्षित ने संचालित किया। इसमें बताया गया कि दृष्टिबाधिता और लो विजन की पहचान और स्क्रीनिंग कैसे की जाए, Functional Vision का आकलन कैसे हो, और दृष्टि संबंधी कठिनाइयां रोज़मर्रा की ज़िंदगी व पढ़ाई-लिखाई को किस तरह प्रभावित करती हैं।
विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर दिव्यांगता की पहचान समय रहते हो जाए और सही समय पर हस्तक्षेप किया जाए, तो व्यक्ति की कार्यात्मक स्वतंत्रता, पढ़ाई में भागीदारी और सामाजिक समावेशन को काफी बेहतर बनाया जा सकता है। इस दौरान शैक्षिक अनुकूलन, सहायक तकनीक और पुनर्वास सेवाओं की भूमिका पर भी बात हुई।
श्रवण बाधिता और वाक्-भाषा से जुड़ी कठिनाइयों पर वरुण कुमार ने अपना सत्र लिया, जिसमें उन्होंने इनकी पहचान, संचार विकास और ज़रूरी सहयोगात्मक व पुनर्वास उपायों की जानकारी साझा की।
प्रोस्थेटिक-ऑर्थोटिक सेवाओं से लेकर बौद्धिक दिव्यांगता तक चर्चा
लोकोमोटर डिसऑर्डर और प्रोस्थेटिक-ऑर्थोटिक ज़रूरतों पर संत कुमार और राज कमल ने प्रशिक्षण दिया। उन्होंने गतिशीलता से जुड़ी दिक्कतों, सहायक उपकरणों की ज़रूरत और प्रोस्थेटिक-ऑर्थोटिक सेवाओं के व्यावहारिक इस्तेमाल के बारे में बताया।
इसके बाद बौद्धिक दिव्यांगता और सेरेब्रल पाल्सी पर डॉ. संजय कुमार और डॉ. महेश कुमार चौधरी का सत्र हुआ, जिसमें इनकी पहचान, आकलन, प्रारंभिक हस्तक्षेप, शैक्षिक ज़रूरतों और पुनर्वास की कारगर रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।
हर बच्चे के लिए अलग IEP बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर
कार्यशाला का एक अहम हिस्सा रहा Actionable Frameworks एवं Individualized Education Plan (IEP) Formulation सत्र, जिसका संचालन विशेष शिक्षा संकाय के डीन डॉ. कौशल शर्मा ने किया। उन्होंने समझाया कि दिव्यांग बच्चों की व्यक्तिगत ज़रूरतों के हिसाब से IEP कैसे तैयार किया जाए, बच्चे के मौजूदा कार्यात्मक स्तर का आकलन कैसे हो, शैक्षिक लक्ष्य कैसे तय किए जाएं और हस्तक्षेप की कार्ययोजना किस तरह बनाई जाए।
डॉ. शर्मा ने खास तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया कि हर बच्चे की क्षमताओं और ज़रूरतों के मुताबिक ऐसे शैक्षिक लक्ष्य तय होने चाहिए जो मापने लायक, व्यावहारिक और नतीजों पर केंद्रित हों।
कुलपति के मार्गदर्शन में बनी साझेदारी
इस कार्यक्रम में डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य संजय सिंह के मार्गदर्शन और विशेष शिक्षा संकाय की विशेषज्ञता की अहम भूमिका रही। विश्वविद्यालय ने दिव्यांगता के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी अकादमिक और व्यावहारिक विशेषज्ञता सैन्य चिकित्सा एवं पुनर्वास व्यवस्था के साथ साझा की।
यह कार्यशाला सैन्य अस्पताल मेरठ और शकुंतला विश्वविद्यालय के बीच अनुभव और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। इससे चिकित्सा, विशेष शिक्षा और पुनर्वास को एक साझा मंच पर लाने में मदद मिली, जिससे दिव्यांग व्यक्तियों के लिए ज़्यादा प्रभावी और समन्वित सेवाओं की राह भी आसान हुई।
कार्यक्रम के पहले दिन का समापन इवनिंग टी के साथ हुआ। इस संयुक्त पहल को दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समावेशी, व्यक्ति-केंद्रित और गुणवत्तापूर्ण पुनर्वास सेवाओं को मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
