'वंदे मातरम्' राष्ट्रीय चेतना का गीत है: बीबीएयू में कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा
लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में शुक्रवार को माहौल कुछ खास रहा। हिंदी प्रकोष्ठ की ओर से आयोजित एक विचार गोष्ठी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन-दर्शन और 'वंदे मातरम्' गीत की सांस्कृतिक विरासत पर गहन चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने की। मंच पर शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल, स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संयोजक अनुपम श्रीवास्तव और कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद आयोजन समिति ने मंचासीन अतिथियों को अंगवस्त्रम और स्मृति चिन्ह भेंट कर आभार व्यक्त किया। डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य और रूपरेखा से अवगत कराया।
प्रो. सुनीता मिश्रा बोलीं: वंदे मातरम् ने जगाई थी एकजुटता की भावना
अपने संबोधन में प्रो. सुनीता मिश्रा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन और राष्ट्रहित में किए गए उनके कार्यों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने देश और समाज के हित को हमेशा सर्वोपरि रखा और अपना पूरा जीवन राष्ट्रसेवा तथा समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने 'वंदे मातरम्' की अहमियत पर बात करते हुए कहा कि यह गीत देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय चेतना की भावना का संचार करता है। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इस गीत ने लोगों में देश के प्रति समर्पण और एकजुटता की भावना को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई थी।
प्रो. राजशरण शाही: भाषा सिर्फ संवाद नहीं, ज्ञान और संस्कृति का आधार
शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही ने 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शैक्षणिक चिंतन' विषय पर बोलते हुए भारतीय शिक्षा और संस्कृति की मूल भावना पर रोशनी डाली। उनके मुताबिक भारत का आदर्श हमेशा से प्रेम, आपसी सामंजस्य और जनकल्याण पर टिका रहा है, जबकि पश्चिमी संस्कृति के केंद्र में बाजार और शोषण की प्रवृत्ति रही है।
प्रो. शाही ने यह भी कहा कि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने भारतीय शिक्षा के स्वरूप में बड़ा बदलाव ला दिया, जिसके चलते शिक्षा और समाज के सामने कई चुनौतियां खड़ी हुईं। उनके अनुसार इन चुनौतियों से निपटने का सबसे कारगर रास्ता भारतीय भाषाओं को मज़बूत बनाना है, क्योंकि भाषा सिर्फ संवाद का साधन नहीं बल्कि ज्ञान, संस्कृति और विचारों को आगे ले जाने का मूल आधार है।
डॉ. पवनपुत्र बादल: वंदे मातरम् भारतीय सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने 'वंदे मातरम्: एक सांस्कृतिक पहचान' विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत में स्वदेशी भावना ने भारतीय आत्मा में नई ऊर्जा भरने का काम किया और लोगों को अपनी संस्कृति व परंपराओं के प्रति और करीब लाया।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित 'वंदे मातरम्' के ऐतिहासिक महत्व को याद करते हुए डॉ. बादल ने कहा कि इस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना को और सशक्त बनाया। उन्होंने इसे भारतीय राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण प्रतीक बताया।
अनुपम श्रीवास्तव का नारा: हर घर स्वदेशी, हर युवा उद्यमी
स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संयोजक अनुपम श्रीवास्तव ने 'दीनदयाल जी की दृष्टि में स्वदेशी और स्वावलंबन' विषय पर विचार रखते हुए कहा कि दीनदयाल उपाध्याय के लिए स्वदेशी सिर्फ वस्तुओं के इस्तेमाल तक सीमित नहीं था, बल्कि यह देश की आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता की नींव थी।
उन्होंने लोगों से स्वदेशी उत्पाद अपनाने और स्थानीय स्तर पर बनी चीज़ों को बढ़ावा देने की अपील की। साथ ही युवाओं को सिर्फ नौकरी तलाशने के बजाय रोज़गार सृजन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य होना चाहिए — "हर घर स्वदेशी और हर युवा उद्यमी।"
इस मौके पर मौजूद सभी प्रतिभागियों ने स्वदेशी भावना को अपने जीवन में अपनाने और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की शपथ ली।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रीति राय ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान प्रो. सनातन नायक, प्रो. बी.एन. दुबे, डॉ. नमिता जैसल, डॉ. रमेश चंद्र नैलवाल, डॉ. संध्या दीक्षित समेत कई शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
